Monday, May 5, 2014


मैं

यूँ तो निराकार हूँ,

लोग मुझे काया रहित कहते हैं

लेकिन सब मुझपे ही आश्रित रहते हैं

मेरा ही संकलन जब पुराना हो जाता है, इतिहास कहलाता है

जिसने भी मेरे महत्व को स्वीकारा है, सच कहता हूँ मैंने उसका जीवन संवारा है

लेकिन

जब भी कोई मुझे मानवीय भावनाओं के सीमित से दायरे में

कैद करना चाहता है

या तो मिट जाता है या पागल हो जाता है।

जो मेरे अस्तित्व को चुनौती देते हैं, ख़ुद ही बदल जाते हैं

मैं किसी सांचे में नही ढलता, सब मेरे सांचे में ढल जाते हैं

मैंने ही मानव को घुटनों के बल चलना दौड़ना सिखाया है, उसके कोमल भावों को अभिव्यक्ति दी है,

उसको आत्मनिर्भरता की शक्ति दी है.

मैंने उसके यौवन को, प्रेम और त्याग के पुष्पों से सजाया है

और उसकी वृद्ध काया की एक - एक झुर्री में, मेरे और उसके संबंधों का एक - एक अनुभव समाया है।

परिवर्तनशीलता मेरा स्वभाव है, दृश्य मेरा प्रक्षेपण

मैं स्वयं में एक विषय हूँ,

मैं

समय हूँ.

Saturday, October 4, 2008

Tajurbe

मंज़िल के पास आके लुट गया वो कारवां देखा
रहते बहार के उजड़ गया वो बागवां देखा
घर बहुत देखे जो सजते हैं गुल -ऐ - अरमान से
खाक -ऐ -अरमां पे जो बनता है वो आशियाँ देखा

तूफ़ान के थम जाने पर खामोशियाँ बिखरी देखीं
खामोशी के दामन में मचलता हुआ तूफां देखा
ज़िन्दगी बिकती देखी चंद जज़्बातों की खातिर
पेट की खातिर यहाँ बिकता हुआ इन्सां देखा

तूफ़ान में तो दुनिया साहिल को ढूँढती है
कश्ती - ऐ - दिल को डुबो दे वो किनारा देखा
हुस्न - परस्ती की तो रौनक है जहाँ में महफिल
वफ़ा - परस्ती का बुझता सा सितारा देखा

ख्वाबों में बसके रह गया ऐसा तो जहाँ देखा
दोस्ती के मीठे खंजर का गहरा सा निशाँ देखा
क्या तुमको सुनाएँ हम, क्या तुमको बताएं हम
इंसानों की इस बस्ती में हमने क्या - क्या देखा


मैं

पहले कुछ अश्क, बाद में दरिया सा बन गया
कुछ इस कदर पिघलता चला जा रहा हूँ मैं
कल के कसे लिबास ढीले हुए हैं आज
पल-पल यूँ सिमटता चला जा रहा हूँ मैं
आदत सी हो गई है मिलकर के बिछड़ने की
अब ख़ुद से ही बिछड़ता चला जा रहा हूँ मैं
इक दिन तो दिल के तोड़ने वाले को चुभूंगा
शीशा हूँ और बिखरता चला जा रहा हूँ मैं

खामोशी

आती जाती हुई हवा चुप है
और परिंदों की भी जुबां चुप है
हाथ उठते हैं पर दुआ खामोश
लब तो हिलते हैं पर सदा चुप है
फूलों की रंगत, खुशबू का झोंका
सभी कुछ खोके बागवां चुप है
तुम्हारे जाते हुए क़दमों की आहट को संजो
ये ज़मीं चुप है आस्मां चुप है

ज़िन्दगी

आस्मां झुकता नहीं ज़मीं के लिए
वक्त रुकता नहीं किसी के लिए
उनकी मुट्ठी हवा ही रहती है
जो लपकते हैं रोशनी के लिए
दूसरों की मुस्कराहट छीनने वाले
ख़ुद तरस जाते हैं हँसी के लिए
इक तमाशा बहुत अजब है यहाँ
लोग मरते हैं ज़िन्दगी के लिए

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